परिवार का बिखराव ।
कृष्ण नहीं चाहते थे,
एक युग की समाप्ति ।
धृतराष्ट्र नहीं चाहते थे,
राज-पतन।
द्रौपदी नहीं चाहती थी-
चीर हरण।
इसके बावजूद ,
वह सब हुआ
जो नहीं होना था ।
आज हमारा न चाहना,
हमारी चुप्पी में
चाहने की स्वीकृति ही तो है । [1]
इस देश की यही कहानी है , हम सब गलत बात का विरोध करने की बजाय, चुप्पी साधना बेहतर समझते है। प्रखर विरोध का साहस ही नहीं कर पाते और देश के कर्ताधर्ता उस मौन को सहमति मान अपनी मनमर्जी कर लेते है।
बंटवारे का भी यही किस्सा है, जिन्हे अलग देश चाहिए वे बहुत मुखर थे , बहुसंख्यक जो किसी तरह का कोई बंटवारा नहीं चाहते थे , चुप्पी साध कर घर बैठ गए। इसीलिए प्रश्न यह है कि क्या मातृभूमि का यह भाग रक्षा करने के लायक नहीं था या फिर हम में मातृभूमि की रक्षा के लिए मरमिटने का जज्बा नहीं था?
लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओ ने अपने फैसले पर एक आदर्शवाद का मुलम्मा चढ़ा कर , बहुसंख्यक वर्ग से बंटवारा होना चाहिए या नहीं, इस बारे उसकी इच्छा जानने का प्रयास ही नहीं किया। वहीं दूसरी और ९०% से ज्यादा अल्पसंख्यक वर्ग के लोगो ने मुस्लिम लीग को वोट देकर अलग राष्ट्र की हामी भर दी थी।
मगर जो चीज़ समझ से परे है वह थी गाँधी और नेहरू का इस बंटवारे का प्रखर विरोध न करना, धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाले ये नेता जिन्ना का खुलकर विरोध करने से परहेज करते रहे, अपने इस सिद्धांत की खातिर किसी भी तरह की क़ुरबानी देने से हिचकते रहे।
गाँधी भले यह कहते रहे कि विभाजन मेरी लाश पर होगा , मगर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के चलते भीष्म की तरह वे भी राजा की हाँ में हाँ मिलाते रहे। भीष्म की तरह उन्होंने भी इसे एक सैद्धांतिक जामा पहनाने का प्रयास ही किया था। फिर कई अन्य जो विभाजन का विरोध तो करते थे मगर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने का जज्बा नहीं रखते थे।
जिन्हे अलग देश चाहिए था वे मरने मारने पर तुले हुए थे और जिन पर देश बचाने की जिम्मेदारी थी वे आदर्शवाद का लबादा ओढ़कर बैठे थे।
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फिर भी इस विषय पर बात करने पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम लोग जो कुछ भी कहेंगे वह अर्ध्य सत्य ही होगा, सत्य से कौसो दूर होगा क्योकि हम और आप सिर्फ उतना ही जानते है जितना देश के कर्ता-धर्ताओ ने हमें बताया है। इसीलिए गलत सही कि बजाय यह जानना बेहतर होगा कि क्या कोई अन्य विकल्प देश के सामने थे , क्या हम विभाजन टाल सकते थे या त्रासदी को कम कर सकते थे?
इसीलिए प्रश्न यह नहीं है कि बंटवारा गलत था या सही , प्रश्न यह है कि
क्या विभाजन टाला जा सकता था और क्या हमने विभाजन टालने के भरसक प्रयास किये थे ? यदि भारत अविभाजित रहता तो देश को कौन सी परेशानियों का सामना करना पड़ता?
क्या विभाजित हिस्सा सिर्फ जमीं का एक टुकड़ा था और अगर नहीं तो, राष्ट्र की एकता के लिए जो कीमत अदा की जाती, क्या वह मातृभूमि की अखंडता और सम्मान के हिसाब से बहुत ज्यादा होती?
तत्कालीन नेतृत्व ने क्यों ब्लैकमेलिंग के आगे हथियार डाल दिए थे? या बंटवारे स्वीकारने के पीछे कोई और कारण भी था?
वे कौन से कारण थे जिनके चलते, कांग्रेस ने मुस्लिम वर्ग का विश्वास खो दिया था , धर्मनिरपेक्षता की असफलता या सम्प्रदायवाद ? क्या यह संभव था कि यदि कांग्रेस कुछ त्याग करती तो मुस्लिम समाज का विश्वास फिर से जीत सकती थी?
जब देवबंद जैसे कई मुस्लिम संगठन और अब्दुल गफ्फार खान[3] जैसे बड़े मुस्लिम नेता भी बंटवारे के खिलाफ थे तो फिर सिर्फ जिन्ना और मुस्लिम लीग को क्यों मुस्लिम समाज का नुमाइंदा मान लिया गया?
जो लोग विभाजन के प्रखर विरोधी थे, क्या उनके मत को भी सुनने का प्रयास किया गया था या सिर्फ चंद लोगो ने विभाजन को मानने का फैसला कर लिया था?
डायरेक्ट एक्शन डे की विभीषिका देखने के बाद भी तत्कालीन नेतृत्व विभाजन के संभावित खौफनाक मंज़र से क्यों अनजान था? नरसंहार रोकने के समुचित उपाय क्यों नहीं किये गए या तत्कालीन नेतृत्व नरसंहार रोकने में असमर्थ था ?
पाकिस्तान में फंसे हिन्दुओ को बचाने के कोई गंभीर प्रयास क्यों नहीं किये गए ?
क्या इस विभाजन को लागु करने का कोई भी ऐसा तरीका नहीं था जिससे लाखो लोगो की जान बचाई जा सकती थी?
ये वे प्रश्न है जिनके जवाब हमें सोचने को मजबूर करेंगे कि विभाजन की त्रासदी किसकी विफलता का परिणाम था?
विभाजन के इतने साल यह जानना ज्यादा जरुरी है कि हम कहाँ गलत हुए और अगर भविष्य में ऐसे हालात फिर से पैदा हुए तो क्या यह राष्ट्र अपनी पुरानी गलतियों से कुछ सीख पाया है?
क्या हम भविष्य में होने वाली ऐसी किसी भी आपदा से निबटने के लिए तैयार है? या हम सिर्फ किताबी खानापूर्ति करने में विश्वास रखते है?



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Hello readers,
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comment karne se pahle kuchh baat batana chahta hun
1.Aap comment me galat sabdo ka prayog nahi karenge.
2App comment mein English grammar aur translation se related koi bhi question puch sakte hain.
thanks